पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- विदेश मामलों पर संसदीय स्थायी समिति ने हाल ही में ‘भारत की आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्रों में भूमिका एवं उपस्थिति’ शीर्षक से अपनी रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में भारत की ध्रुवीय भागीदारी की समीक्षा करते हुए आर्कटिक क्षेत्र में भारत की प्रमुख क्षमतागत कमियों को रेखांकित किया गया है।
भारत की आर्कटिक भागीदारी: अतीत एवं वर्तमान
- भारत की आर्कटिक भागीदारी ऐतिहासिक रूप से वैज्ञानिक अनुसंधान और जलवायु अध्ययनों पर केंद्रित रही है, किंतु अब यह क्षेत्र व्यापक सामरिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक महत्व प्राप्त कर रहा है।
- भारत की आर्कटिक क्षेत्र में भागीदारी वर्ष 1920 की स्वालबार्ड संधि से जुड़ी है। इस संधि के अंतर्गत भारतीय नागरिकों को संधि के प्रावधानों के अधीन स्वालबार्ड तक पहुँच तथा वाणिज्यिक गतिविधियाँ संचालित करने के अधिकार प्राप्त हैं।
- भारत ने वर्ष 2008 में स्वालबार्ड के न्य-ऑलेसुंड में अपना स्थायी आर्कटिक अनुसंधान केंद्र ‘हिमाद्रि’ स्थापित किया।
- भारत वर्ष 2013 में आर्कटिक परिषद में पर्यवेक्षक बना।
- वर्तमान में भारतीय संस्थान जलवायु परिवर्तन, वायुमंडलीय विज्ञान, हिमनद विज्ञान, समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और ध्रुवीय जीवविज्ञान जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान कर रहे हैं।
- हालाँकि, भारत की उपस्थिति अभी भी मुख्यतः स्वालबार्ड के आसपास केंद्रित है तथा सीमित बुनियादी ढाँचे और वित्तीय संसाधनों के कारण बाधित है।
भारत की आर्कटिक नीति, 2022
- यह नीति आर्कटिक क्षेत्र में भारत की भागीदारी के लिए एक व्यापक रूपरेखा प्रदान करती है। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
- वैज्ञानिक अनुसंधान एवं निगरानी को प्रोत्साहन देना।
- आर्कटिक जलवायु प्रक्रियाओं तथा उनके भारत पर प्रभाव को समझना।
- पर्यावरणीय स्थिरता को ध्यान में रखते हुए आर्थिक एवं मानव विकास को प्रोत्साहित करना।
- आर्कटिक देशों के साथ सहयोग को सुदृढ़ करना।
- आर्कटिक शासन व्यवस्था में भारत की भूमिका को सुदृढ़ करना।
- ध्रुवीय अनुसंधान एवं लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में राष्ट्रीय क्षमता का विकास करना।
- संसदीय समिति ने प्रभावी रूप से इस आवश्यकता को रेखांकित किया है कि इस नीतिगत रूपरेखा को संस्थागत एवं भौतिक क्षमताओं में परिवर्तित किया जाना आवश्यक है।
भारत की आर्कटिक क्षेत्र में साख एवं क्षमताएँ
- भारत के पास कई महत्वपूर्ण आधार एवं क्षमताएँ हैं:
- 1920 की स्वालबार्ड संधि का हस्ताक्षरकर्ता।
- स्वालबार्ड में स्थायी अनुसंधान केंद्र हिमाद्रि।
- अनुसंधान पोत सागर कन्या तथा अन्य समुद्री वैज्ञानिक क्षमताओं ने ध्रुवीय अनुसंधान में सहयोग दिया है।
- राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं महासागर अनुसंधान केंद्र (NCPOR) भारत के ध्रुवीय कार्यक्रमों का समन्वय करता है।
- भारत ने आर्कटिक देशों के साथ राजनयिक एवं वैज्ञानिक सहयोग बनाए रखा है तथा पर्यवेक्षक के रूप में आर्कटिक परिषद की गतिविधियों में भाग लिया है।
वैश्विक प्रयास एवं भागीदारी
- आर्कटिक क्षेत्र पर रूस, अमेरिका, कनाडा और नॉर्डिक देशों के हितों का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है, जबकि चीन ने गैर-आर्कटिक देश होने के बावजूद इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति का विस्तार किया है।
- चीन स्वयं को ‘निकट-आर्कटिक राज्य’ के रूप में संदर्भित करता है तथा उसने ध्रुवीय अनुसंधान, बुनियादी ढाँचे और नौवहन में निवेश किया है।
- आर्कटिक परिषद सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण से संबंधित मुद्दों पर सहयोग का प्रमुख मंच है, किंतु भू-राजनीतिक संघर्षों ने सहयोग की प्रक्रिया को प्रभावित किया है।
- भारत के लिए रूस, अमेरिका और नॉर्डिक देशों के साथ संपर्क तथा आर्कटिक क्षेत्र के वैज्ञानिक तथा शासन संबंधी प्रक्रियाओं में भागीदारी, सामरिक एवं विकासात्मक उद्देश्यों के बीच संतुलन स्थापित करने के अवसर प्रदान करती है।
विश्व और भारत के लिए महत्व
- जलवायु सुरक्षा: आर्कटिक क्षेत्र का बढ़ता तापमान वैश्विक जलवायु पर व्यापक प्रभाव डाल रहा है। उभरते हुए अनुसंधान आर्कटिक समुद्री-बर्फ में होने वाले परिवर्तनों को दक्षिण एशियाई मानसून की गतिविधियों से जोड़ते हैं।
- भारत में कृषि एवं आजीविका की पर्याप्त निर्भरता मानसूनी वर्षा पर होने के कारण आर्कटिक परिवर्तनों के खाद्य एवं आजीविका सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभाव महत्वपूर्ण हैं।
- समुद्र-स्तर में वृद्धि: आर्कटिक बर्फ के पिघलने से वैश्विक समुद्र-स्तर में परिवर्तन होता है, जिससे निचले तटीय क्षेत्रों और द्वीपीय देशों के लिए खतरा बढ़ता है।
- भारत के लिए इसके तटीय आबादी, बुनियादी ढाँचे, पारिस्थितिकी तंत्र और आपदा प्रबंधन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकते हैं।
- सामरिक एवं आर्थिक महत्व: समुद्री मार्गों, विशेषकर उत्तरी समुद्री मार्ग के खुलने से वैश्विक नौवहन के स्वरूप में परिवर्तन आ सकता है।
- आर्कटिक क्षेत्र ऊर्जा संसाधनों और महत्वपूर्ण खनिजों से समृद्ध है तथा भविष्य की वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में इसका महत्व और बढ़ सकता है।
- भू-राजनीतिक महत्व: वैश्विक भागीदारी में वृद्धि आर्कटिक को भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के एक नए क्षेत्र के रूप में स्थापित कर रही है।
- अतः भारत को इस क्षेत्र को जलवायु-सुरक्षा और भू-राजनीतिक—दोनों दृष्टिकोणों से देखने की आवश्यकता है।
संबंधित चिंताएँ एवं मुद्दे
- संस्थागत विखंडन: आर्कटिक से संबंधित जिम्मेदारियाँ विदेश मंत्रालय के विभिन्न प्रभागों में विभाजित हैं।
- समर्पित आर्कटिक दूत का अभाव: भारत के पास ध्रुवीय कूटनीति के लिए विशेष रूप से उत्तरदायी कोई वरिष्ठ अधिकारी नहीं है।
- अनुसंधान अवसंरचना की कमी: भारत के पास अपना विशिष्ट ध्रुवीय अनुसंधान पोत नहीं है।
- संसाधनों की कमी: समिति ने उल्लेख किया कि वर्ष 2024-25 में भारत ने आर्कटिक अभियानों के लिए लगभग ₹17.53 करोड़ ही आवंटित किए, जो घोषित महत्वाकांक्षाओं और बजटीय प्रावधानों के बीच अंतर को दर्शाता है।
- सीमित पैन-आर्कटिक पहुँच: विदेशी पोतों और साझेदारियों पर निर्भरता के कारण स्वालबार्ड से बाहर लंबे समय तक अनुसंधान गतिविधियाँ संचालित करने की क्षमता सीमित रहती है।
- भू-राजनीतिक अनिश्चितता: रूस और पश्चिमी देशों के बीच तनाव तथा बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा आर्कटिक क्षेत्र में सहयोग को बाधित कर रही है।
आगे की राह
- भारत की आर्कटिक कूटनीति का नेतृत्व करने तथा सम्पूर्ण-सरकार दृष्टिकोण सुनिश्चित करने के लिए ध्रुवीय राजदूत/विशेष दूत की नियुक्ति की जाए।
- ध्रुवीय अनुसंधान पोत की व्यवस्था में तीव्रता लाई जाए तथा परिचालन पहुँच का विस्तार करने के लिए अंतरिम रूप से पोत के अधिग्रहण अथवा चार्टर की रणनीति पर विचार किया जाए।
- आर्कटिक अनुसंधान, लॉजिस्टिक्स, उपग्रह निगरानी और जलवायु मॉडलिंग के लिए समर्पित वित्तपोषण में वृद्धि की जाए।
- नॉर्डिक देशों, रूस, अमेरिका और अन्य आर्कटिक हितधारकों के साथ सहयोग को सुदृढ़ किया जाए।
- आर्कटिक से प्राप्त अवलोकनों को भारतीय मानसून पूर्वानुमान, तटीय विकास और जलवायु जोखिम आकलन में एकीकृत किया जाए।
- आर्कटिक नौवहन, महत्वपूर्ण खनिजों, महासागर शासन और आर्कटिक प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में विशेषज्ञता एवं ज्ञान का विकास किया जाए।
- वैज्ञानिक सहयोग, पर्यावरणीय स्थिरता और सामरिक हितों के बीच संतुलन स्थापित करना भारत की आर्कटिक नीति का प्रमुख आधार होना चाहिए।
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